आलेख.......................... पुराने कपड़ों से रोजगार और कमाई
कपड़ा मनुष्य के जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है, क्योंकि यह शरीर को मौसम के प्रभावों जैसे गर्मी, सर्दी, बारिश और धूल-मिट्टी से सुरक्षा प्रदान करता है। कपड़े शरीर को ढककर मर्यादा और सामाजिक गरिमा बनाए रखते हैं, जिससे व्यक्ति समाज में आत्मविश्वास के साथ रह पाता है। कपड़ा केवल सुरक्षा का साधन ही नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब कपड़ा पुराना हो जाता है है या फट जाता है तब उसे या तो कचरे में फेंक देते हैं या गरीबों को दे देते हैं। शहरों में महिलाएं पुराने कपड़े के बदले बरतन भी देने का काम करती हैं लेकिन इनकी संख्या बहुत कम है। ऐसी स्थिति में नवी मुंबई नगर निगम ने अनुकरणीय पहल की है । यह प्रयास अन्य नगर निगमों / नगर पालिकाओं के लिए प्रेरणादायक सिद्ध हो सकता है। आप भी पढ़िए..... पुराने कपड़ों से रोजगार और कमाई.......
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पुराने कपड़ों से रोजगार और कमाई
भारत में हर साल लगभग 78 लाख मीट्रिक टन वस्त्र अपशिष्ट यानी कपड़ों का कचरा उत्पन्न होता है। इससे पता चलता है कि हमारे देश में कपड़ों का उपयोग बहुत बड़ी मात्रा में उपयोग किया जाता है, इनमें मुख्य रूप से साड़ियों, वर्दियों, जींस (डेनिम) से लेकर घरों में उपयोग होने वाले चादर, परदे और अन्य कपड़े शामिल है । लेकिन यह भी एक सच्चाई है कि इनका बड़ा हिस्सा उपयोग के बाद कचरे में और जला दिया जाता है जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। शहरी कचरे में वस्त्र अपशिष्ट एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है, जिसे अब तक काफी हद तक नजरअंदाज किया जाता रहा है। ऐसे में शहरों में कपड़ों के संग्रह, पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण के लिए सुनियोजित व्यवस्था विकसित करने की आवश्यकता तेजी से महसूस की जा रही है।

इसी दिशा में नवी मुंबई नगर निगम यानी एनएमएमसी ने एक सराहनीय पहल की है। इस पहल के तहत बेलापुर में देश की पहली टेक्सटाइल रिकवरी फैसिलिटी यानी वस्त्र पुनर्प्राप्ति केंद्र स्थापित किया गया है। यह केवल एक संग्रह केंद्र नहीं, बल्कि एक संपूर्ण चक्रीय व्यवस्था है, जिसमें कपड़ों का संग्रह, वैज्ञानिक छंटाई, तकनीक का उपयोग और आजीविका सृजन, सभी को एक साथ जोड़ा गया है। इस मॉडल का उद्देश्य कपड़ों के कचरे को बेकार मानने के बजाय उसे एक उपयोगी संसाधन में बदलना है।
इस व्यवस्था की शुरुआत घर-घर से होती है। नवी मुंबई के सभी आठ वार्डों में स्थित हाउसिंग सोसाइटियों में विशेष कपड़ा संग्रहण डिब्बे लगाए गए हैं। अब तक 140 डिब्बे स्थापित किए जा चुके हैं और 250 डिब्बे स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है, जिससे अधिक से अधिक लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हो सके। लोग अपने पुराने और अनुपयोगी कपड़े इन डिब्बों में डालते हैं, जिन्हें बाद में बेलापुर स्थित केंद्र पर लाया जाता है।

यहां कपड़ों की वैज्ञानिक तरीके से छंटाई की जाती है। सबसे पहले उनका वजन किया जाता है और उन्हें टैग किया जाता है। इसके बाद उन्हें पुनः उपयोग योग्य, पुनर्चक्रण योग्य, अपसाइक्लिंग योग्य, डाउनसाइक्लिंग योग्य और अस्वीकृत श्रेणियों में बांटा जाता है। इस प्रक्रिया में “कोशा हैंडहेल्ड स्कैनर” जैसी आधुनिक तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिससे कपड़ों के रेशों जैसे कपास, पॉलिएस्टर, ऊन और रेशम की तुरंत पहचान कीजाती है। इससे छंटाई अधिक सटीक और प्रभावी होती है।
पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने के लिए एक प्रबंधन सूचना प्रणाली यानी एमआईएस प्लेटफॉर्म भी विकसित किया गया है। इसके माध्यम से कपड़ों की यात्रा अर्थात दाता से लेकर अंतिम उत्पाद तक ट्रैक की जा सकती है। इससे पारदर्शिता, जवाबदेही और बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलती है। छंटाई के बाद कपड़ों को रंग, प्रकार और स्थिति के अनुसार अलग किया जाता है और उपयोग से पहले उन्हें अच्छी तरह से कीटाणुरहित किया जाता है, ताकि स्वच्छता और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
इस पहल की एक और महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह महिलाओं के लिए रोजगार का सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को इस कार्य से जोड़ा गया है। छांटे गए कपड़ों में से उपयोग योग्य कपड़ों को ये महिलाएं बैग, चटाई, पाउच, कपड़े और घरेलू सजावट की वस्तुओं में बदल देती हैं। इस तरह पुराने कपड़ों को नया जीवन मिलता है और वे बाजार में बिकने योग्य उत्पाद बन जाते हैं।

अब तक 300 से अधिक महिलाओं को आठ दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से प्रशिक्षित किया गया है, जिसमें उन्हें फाइबर की पहचान, छंटाई की प्रक्रिया, सिलाई, मरम्मत और अपसाइक्लिंग के कौशल सिखाए गए हैं। इनमें से 150 से अधिक महिलाएं नियमित रूप से इस कार्य में लगी हुई हैं और हर महीने लगभग 9,000 से 15,000 रुपये तक कमा रही हैं। इस प्रकार यह पहल महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ सम्मानजनक आजीविका भी प्रदान कर रही है।
इस परियोजना के परिणाम भी काफी प्रभावशाली रहे हैं। अब तक 30 मीट्रिक टन कपड़ा कचरा एकत्रित किया जा चुका है, जिसमें से 25.5 मीट्रिक टन की वैज्ञानिक छंटाई की गई है। प्रतिदिन औसतन 500 वस्तुओं की दर से 41,000 से अधिक कपड़ों का प्रसंस्करण किया गया है। इस पहल ने 1,14,575 से अधिक परिवारों तक पहुंच बनाई है और 75 से अधिक जागरूकता कार्यशालाओं का आयोजन किया गया है। साथ ही 350 से अधिक सोसाइटी प्रतिनिधियों को इससे जोड़ा गया है, जिससे नागरिक भागीदारी को बढ़ावा मिला है।
इसके अलावा 400 से अधिक अपसाइक्लिंग उत्पादों के नमूने तैयार किए गए हैं। खास बात यह है कि अस्वीकृत कपड़ों से कागज बनाने का भी सफल प्रयोग किया गया है, जो संसाधनों के बेहतर उपयोग का उदाहरण है। जागरूकता बढ़ाने और बाजार के अवसरों का विस्तार करने के लिए इस पहल ने 30 से अधिक प्रदर्शनियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लिया है। इससे लोगों में कपड़ों के पुनः उपयोग और पुनर्चक्रण के प्रति जागरूकता बढ़ी है और महिला कारीगरों को अपने उत्पाद बेचने का अवसर मिला है।
हालांकि इस पहल की शुरुआत में कुछ चुनौतियां भी सामने आईं, जैसे कूड़ेदान लगाने में लोगों का विरोध, कपड़ों के पृथक्करण के प्रति कम जागरूकता और मिश्रित रेशों की छंटाई में कठिनाई। लेकिन इन समस्याओं को चरणबद्ध तरीके से लागू की गई योजना, लगातार जागरूकता अभियान, विभिन्न एजेंसियों के समन्वय और आधुनिक तकनीक के उपयोग से दूर कर लिया गया।
बेलापुर में मिली सफलता के आधार पर अब कोपरखैराने के निसर्ग उद्यान के पास एक स्थायी और अधिक क्षमता वाली टेक्सटाइल रिकवरी फैसिलिटी स्थापित करने की योजना बनाई जा रही है। यह भविष्य में इस पहल को और मजबूत बनाएगी।
नवी मुंबई की यह टेक्सटाइल रिकवरी पहल यह साबित करती है कि जिसे हम आमतौर पर कचरा समझते हैं, वही सही प्रबंधन से आर्थिक और पर्यावरणीय लाभ का बड़ा स्रोत बन सकता है। यदि इस मॉडल को देश के अन्य शहरों में भी अपनाया जाए, तो न केवल कचरे की समस्या कम होगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे और पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिलेगी। (सम्पादन – मधुकर पवार )

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